
मैं कौन हू ?
प्यारे दोस्तो,
मै कौन हू? इस प्रश्न का उत्तर तो मुझे आज तक नही मिला। हा उसीकी तलाशमे ओशोसे जुड गया। सारी दुनिया इस देह को स्वामी प्रेम हर्षल कहती है। मै पैदा होकर बडा हुआ महाराष्ट्र के भुसावल मे। बी.एस्सी. की शिक्षा लेते हुए ओशो के विचारोंसे परिचित हुआ। पहले सालभर दिमाग से उन्हे समझनेका प्रयास किया। इससे सिवाय भ्रांतीया और निराशाके अलावा कुछ हाथ नही लगा। सब तरहसे टुट कर भुसावलके ‘ओशो हरिछाया ध्यान केंद्र’के संचालक स्वामी गोपाल नारायण भारती के पास गया। उन्होने मेरी अवस्था को देखते हुए ध्यान मे उतरनेकी सलाह दी। उन्हीके मार्गदर्शनमे 11 डिसंबर 1994से ध्यान शुरू किया। क्या बताऊ दोस्तो फिर जिंदगी पहले जैसी ना रही। यही तो अवस्था एक आशो प्रेमी (शायद अगेह भारतीजी) ने क्या खूब कही है।
जाने क्या हुवा है तुझसे मिलने के बाद।
लोग कहते है दिवाना तुझसे मिलने के बाद।।
जिंदगी यूँ कट रही थी जैसे हो कोई सजा।
जश्ने चिराग हो उठी तुझसे मिलने के बाद।।
इसके बाद ओशो की करूणा और आशिष से जीवनमे किस तरह फुल खिले है? इसे बयान करने की प्रज्ञा मुझमे नही। 1997 मे जलगॉंव (महाराष्ट्र) मे आयोजित ध्यान शिबिरमे संन्यास लेकर गेरूआ रंग मे रंग गया। इसके बाद जिंदगी मे कई भटकाव आये। बहुत कुछ रूपांतरण हुआ। शेष रहा तो सिर्फ ओशो के प्रति असीम प्यार! दोस्तो ्नया अपनी जिंदगी एक हादसा है?… क्या जो सब लोग जिते है वोही जीवन है?… नही यारो इस धरती पर जन्म लिया है तो कुछ सृजन करने लिए। इसी विचारसे आज तक जी रहा हू। अंदर आयी हुई आवाज सुनकर एक अच्छी खासा करियर छोड पत्रकारितासे जुड गया। उसीमे आज मजबूत कदमसे मंझिल की और दौड रहा हू। हा यह यात्रा अंधी नही इतना आपको बता दू।
आज जलगॉंवमेही एक विख्यात दैनिक मे वरिष्ठ पत्रकार के रूपमे कार्यरत हू। इस ब्लॉग के रूपमे ओशो से मुझे जो मिला वो दुनिया के साथ बाटने का प्रयास कर रहा हू। इसके सिवा जलगॉंव एवम् उसके आजूबाजूमे ओशो के दिवानोंको एक साथ लाने का प्रयास भी जारी है।






I want to meet you
thanks friend,