
ओशो आए… आनंद लाए!
March 28, 2010जैसा की मैने पीछले पोस्टमे जिक्र किया था, जलगावके हमारे मित्र देवीदास सोनार बाबा (स्वामी आनंद प्रेम) एवम् विकासजी विसपुते नेपाल से अभी वापस आये है। इस भावभिनी एवम् आनंद उल्लासमय यात्रा कुछ इस तरह से संपन्न हुई। 13 मार्च 2010 के दिने दोपहरको उन्होने भुसावल स्टेशनसे गुवाहाटी एक्सप्रेससे उन्होने अपनी यात्रा शुरू की। 15 मार्च के सबेरे वो जलपायगुडी पहुचे। प्रकृती की खुबसुरतीका आनंद लेते हुए वो बससे काकडभिट्टा और वहॉसे नेपाल के इटहरी को पहुचे। वैसे तो इटहरी करीबन एक लाख की आबादीवाला छोटा शहर है। वहॉं ओशो के प्रेमियो की संख्या बहोत है। 16 मार्च से सोनारबाबा और विसपुतेजी स्वामी गोपाल भारती के कीर्तनयात्रामे शामिल हुए। हर रोज सबेरे सक्रीय ध्यान से उनका दिन शुरू होता था। शाम चार बजे तर विविध ध्यान एवम् उत्सव करने के बाद उर्जा से लबालब भरे हुए सभी साधक शहर से निकलने वाली रॅली मे शामिल होते थे।
एक ट्रॅक्टर पर ओशो की प्रतिमा लेकर उनका कारवॉ शुरू होता था। ओशो के रंग मे डुबे हुए हसते गाते साधको की टोली पुरे शहरके प्रमुख मार्गोपरसे गुजरती थी। जीवन का उत्सव मनानेवाले इन मस्तानो का जगह जगह बडे प्यारसे स्वागत हुवा। इस दौरान कई सारे नये लोगोंको ओशो से परिचय हुवा। कई सारे परेशानियोसे घिरे नेपालवासियोमे ओशो के प्रति प्रेम की भावना इस सारे यात्रा मे दिखी। रात को यह कारवॉ दुसरे शहर के लिए चलता था। दुसरे दिन यही उत्सव दुसरे शहर मे होता था। इटहरी के बाद विराटनगर और धारान शहरमे ओशो के काफीलेमे हमारे यह दो दोस्त शामिल हुए। 20 मार्च की शाम को विदाई के वेला आयी। नेपाल मे महाराष्ट्र से आए इन दोनो ओशो प्रेमीयोको वहा बहोत प्यार मिला। ‘‘लडकी जब ससुराल जाती है तो उसे जैसी पिडा होती है वैसे ही मै महसूस कर रहा हू’’, इस शब्द मे सोनारबाबाने जैसे ही अलविदा कहा वहा का वातावरण भावभिना हुवा। करीबन ढाईसौ साधकोने उन्हे गले लगाकर आंसुओके साथ बिदाई दी।
विदीत हो की स्वामी गोपालजी भारती इनकी अगुवाई मे नेपालमे 20 फरवरीसे 21 मार्च 2010 तक कीर्तनयात्रा का आयोजन हुवा। उन्हीके सुरीले गीतोंको नेपालके माईधर धापासे आए हुए स्वामी ज्ञान खालिस उन्होने अपनी सुरीली आवाज दी। इस पुरे यात्रा की सफलताके लिए स्वामी गोपालजी भारती को मॉ निर्जरा, इटहरीके स्वामी ध्यान कमल, विराटनगरकी मॉ सत्यम रेणू, आलोक महेंद्र, आनंद तिलोपा, अंतर विकास, नीरव, प्रेम उषा, निर्मल प्रेम इनका सहयोग मिला।
अंतमे: नेपालमे ओशोकी इस यात्रा को मिली सफलता देख हमारे चिरयुवा स्वामी आनंद प्रेम (सोनारबाबा) इन्होने महाराष्ट्र के मुंबईसे लेकर नागपूरतक इस तरहकी कीर्तनयात्रा निकालनेका संकल्प किया है। क्या आप उसमे शामिल होना चाहेंगे हा हा हा…!!





